भगवान गुरु श्री गोरखनाथ जी महाराज का अवतरण सभी जाति धर्म को एकता के सूत्र में बांधने के साथ-साथ भक्त और भगवान के बीच सेतु का कार्य करने वाली भक्ति को जन-जन तक पहुंचाने हेतु हुआ था अध्यक्ष संजीवन नाथ महाराज

सम्पादक प्रमोद कुमार
 
हरिद्वार 5 मई 2025( वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानन्द) इस नासवान संसार को भक्ति मार्ग से कल्याण और मुक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरु श्री गोरखनाथ भगवान के पद चिन्हों पर चलने हेतु संकल्प बध्द गुरु श्री गोरखनाथ अलख अखाड़ा गुरु गोरखनाथ जी की जयंती बड़े ही भव्य एवं दिव्य तरीके से मनाने हेतु प्रयासरत है अखाड़े के अध्यक्ष श्री संजीवन नाथ महाराज ने बताया गुरु भगवान श्री गोरखनाथ इस सृष्टि में भगवान शिव की तरह अजन्मे है जिन्होंने किसी माता के गर्भ से जन्म नहीं लिया गुरु श्री गोरखनाथ का जन्म वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि और मंगलवार के दिन हुआ था उनका जन्म स्थान राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में गोगा मेढी और वेलावल के नजदीक हुआ था और उनके उत्पत्ति किसी माता के गर्भ से न होकर गोबर की कुड़ी से हुआ था गोबर से उत्पन्न होने के कारण इनका नाम गुरु गोरखनाथ पड़ा उन्होंने भक्त और भगवान के बीच सेतु का कार्य करने वाली भक्ति को भगवान तक पहुंचाने का मध्य किस प्रकार बनाया जा सकता है इस बात को भक्तों तक बड़ी बारीकी से समझाने का प्रयास किया है कि कलयुग में की गई सूक्ष्म आराधना भी सतयुग में की गई सैकड़ो वर्ष की तपस्या के स्वरूप फलीभूत होती है और गुरु गोरखनाथ अलख अखाड़ा गुरु गोरखनाथ की इस समझाई गई सूक्ष्म भक्ति की बात को विश्व भर के करोड़ भक्तों तक पहुंचाने हेतु प्रयासरत है की कलयुग में सूक्ष्म आराधना भवसागर पार करने का माध्यम बनेगी हमारी इन्ही बारीकियों को समझते हुए आध्यात्मिक जगत से जुड़े हजारों साधु संत भक्ति ऋषि मुनि अखाड़े से जुड़ने हेतु प्रयास रत बहुत से संत महापुरुष महामंडलेश्वर महंत अखाड़े से जुड़ भी चुके हैं एवम इस वर्ष सवा लाख नये सदस्य बनाने का संकल्प अखाड़ा पूर्ण करने की दिशा की और दिन प्रतिदिन कदम बढ़ा रहा है संत महापुरुष बुद्धिजीवी भक्त अखाड़े से दिन प्रतिदिन जुड़ रहे हैं हमारा संकल्प विश्व भर में ईश्वर भक्ति और सनातन संस्कृति का प्रचार प्रसार करना है संत महापुरुषों की पावन महिमा को विश्व भर में प्रचारित करना अखाड़े का मुख्य उद्देश्य है महामंडलेश्वर श्री शंकर नाथ महाराज ने कहा अखाड़े का उद्देश्य हमारी प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति को पुनः स्थापित करने का है हम पश्चात संस्कृति के बहाव में बहकर अपनी सभ्यता और संस्कृति को पीछे छोड़ चले हैं पश्चात संस्कृति हमें पतन की और ले जा रही है हमें पश्चात संस्कृति का त्याग कर अपनी प्राचीन सभ्यता आचार विचार और संस्कृति में वापस आना है।