भगवान आपके हृदय में भी है और मेरे हृदय में भी हैं आवश्यकता है सच्चे मन से पुकारने की स्वामी साक्षी गोपालानन्द महाराज

सम्पादक प्रमोद कुमार
हरिद्वार( वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानन्द )भूपतवाला स्थित श्री प्रभुतानन्द आश्रम में परम पूज्य गुरुदेव श्री श्री स्वामी सत्य देवानन्द महाराज की पावन स्मृति में वार्षिक कार्यक्रम एक संत सम्मेलन के रूप में आयोजित किया गया इस अवसर पर बोलते हुए स्वामी साक्षी गोपालानन्द महाराज ने कहा संत महापुरुष इस पृथ्वी लोक पर चलते-फिरते तीर्थ होते हैं किसी तीर्थ स्थल के दर्शन के लियें आपको स्वयं चल कर जाना पड़ता है किंतु एक संत के रूप में आपको कभी भी कहीं भी एक संत रूपी तीर्थ के दर्शन हो सकती है परम पूज्य गुरुदेव ब्रह्मलीन स्वामी सत्य देवानन्द महाराज इस पृथ्वी लोक पर सारस्वत ज्ञान की एक प्रवाहित गंगा थे जिनके ज्ञान रूपी सरोवर में स्नान कर भक्त अपने जीवन को धन्य तथा कृतार्थ किया करते थे उनकी पावन स्मृतियां आज भी हमारे जीवन को मन मस्तिष्क को ज्ञान से आलोकित करती है संत महापुरुषों का जीवन समाज को समर्पित होता है संतो द्वारा किये जाने वाले सभी कार्यों में जगत कल्याण की भावना निहित होती है सतगुरु पार ब्रह्म है सतगुरु की शरण में जो आते हैं वह कल्याण को प्राप्त होने के साथ-साथ इस लोक से चले जाने के बाद भवसागर पार हो जाते हैं हम इस बात का आकलन भगवान राम के नाम से कर सकते हैं सिर्फ तीन अक्षर का एक शब्द राम कहने में छोटा लगता है किंतु इसमें संपूर्ण त्रिलोक व्याप्त है राम नाम की आभा संपूर्ण त्रिलोकों को पार करते हुए भवसागर पार जाती है अगर त्याग की सीख लेनी है तो भगवान राम के भ्राता लक्ष्मण जी से ले माना भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास जाना था किंतु उनके भराता लखन ने राजसुख राजभोग त्याग कर अपने भाई के साथ वन जाना स्वीकार किया और 14 वर्ष तक बिना सोये भगवान राम माता जानकी का पहरा देते रहे इससे भी बड़ी सीख लेनी है तो उनके भ्राता भरत के जीवन से ले जिस माता ने उन्हें राजपाठ दिलवाने के लियें भगवान राम को वनवास भिजवा दिया उसी माता के पुत्र भरत ने भगवान राम की शरण में जाकर उन्हें राज पाठ सौपने का परण लिया और वन में भगवान राम की शरण में चले गये और भगवान राम के समझाने पर उन्होंने भगवान राम की चरण पादुकाये अपने शीश पर धारण कर सिंहासन पर चरण पादुकाये रखकर भगवान राम की तरह वन में रहकर वहां से राज पाठ का कार्य किया और 14 वर्ष का वनवास पूर्ण होते ही भगवान राम को उनका राज पाठ उन्हें सौंप दिया स्वामी साक्षी गोपालानन्द महाराज ने भक्तजनों को कहा आजकल आप गुरु धाम में आने के बाद भी सुख सुविधा देखते हैं साधन देखते हैं जो कि गलत है गुरु धाम में तो जहां-जगह मिल जाये वही मनुष्य को डेरा जमा लेना चाहिये यह मांग नहीं करनी चाहिये कि मुझे नीचे का कमरा दो जहां-जगह मिले वही बैठकर गुरुजनों के श्री मुख से बह रही ज्ञान की गंगा में गोते लगा लो गुरु धाम में सांसारिक बातो और सुख सुविधा का मोह त्याग देना चाहिये और पूरी तरह गुरु वचनों के शरणागत होकर कल्याण का मार्ग चुनना चाहिये राम ही सूरत राम ही मूरत राम ही पीड़ा राम ही मरहम और राम करे उपचार रे कहने का मतलब यह है भगवान श्री हरि भगवान श्री राम स्वरूप अलग-अलग है किंतु है एक ही वह तुम्हारे अंदर भी विद्यमान है और मेरे अंदर भी विद्यमान है आवश्यकता है तो सच्चे हृदय से उन्हें पुकारने की हमारे सतगुरु इस पृथ्वी लोक पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में हमारे मार्गदर्शन हेतु अवतरित होते हैं इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी प्रेमानन्द महाराज ने कहा गुरु धाम पावन ज्ञान की त्रिवेणी होते हैं वहां गुरुजनों की शरण में जाकर ज्ञान की गंगा में गोते लगाकर अपना मानव जीवन सार्थक करना चाहिये ज्ञान वह है जिसे मस्तिष्क स्वीकार करें मठ मंदिर आश्रम अखाड़े तो संत महापुरुष भक्तजनों की सुविधा हेतु बनाते हैं वरना संत महापुरुष तो जंगल में कुटिया बनाकर अपना जीवन वहां भी व्यक्ति कर सकते हैं जैसे मीरा देवी ने भक्ति की उन्होंने भक्ति करने हेतु संपूर्ण संसार को चुना यहां भ्रमण किया वहां भ्रमण किया उन्होंने मठ मंदिर नहीं बनाये एवम भक्ति की सभी पराकाष्ठायें पूर्ण की इस अवसर पर महंत शांति प्रकाश महंत कैलाशानन्द महाराज कोतवाल कमल मुनि महाराज श्याम गिरी महाराज धर्मदास महाराज सहित भारी संख्या में संत महापुरुष उपस्थित थे सभी संत महापुरुषों के श्री मुख से बहने वाली ज्ञान की गंगा में सभी भक्तजनों ने गोते लगाकर अपने जीवन को धन्य तथा कृतार्थ किया ।