30 November 2025

मछली तभी तक सुरक्षित है जब तक वह समुद्र या तालाब में है और मनुष्य तभी तक सुरक्षित है जब तक वह धर्म के मार्ग पर है कथा व्यास विदुषी देवी भवानी

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार प्रेम नगर आश्रम में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के समापन के कथा व्यासविदुषी देवी भवानी ने कृष्ण के 16,108 रानियों से विवाह तथा द्वारका के समुद्र में विलय
भारत की महान सांस्कृतिक विरासत में श्रीकृष्ण के जीवन चरित्र का विशेष स्थान है। श्रीकृष्ण केवल द्वापर युग के एक महापुरुष नहीं, बल्कि प्रेम, मित्रता, नीति, करुणा, कर्तव्य, धर्म और दिव्यता का अद्भुत संगम हैं। उनके जीवन में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जो भाव-विभोर कर देते हैं—चाहे वह निर्धन सुदामा का उनकी द्वारिका में स्वागत हो, या 16,108 कन्याओं को राक्षसों के बंधन से मुक्त कर उनका संरक्षण एवं विवाह करना हो, या फिर द्वारका का समुद्र में विलय होकर कृष्ण-लीला का पूर्ण होना।
इन तीनों घटनाओं में मानवता, धर्म और नीति के गहरे संदेश निहित हैं।
सुदामा चरित्र – सच्ची मित्रता का अमर उदाहरण**
सुदामा और कृष्ण की मित्रता गुरुकुल काल से चली आ रही थी। सुदामा निर्धन ब्राह्मण थे, घर की हालत अत्यंत दयनीय थी। उनकी पत्नी सुशीला ने एक दिन उनसे आग्रह किया कि वे अपने मित्र कृष्ण से मिलने द्वारका जाएँ—औपचारिक रूप से सहायता मांगने के लिए नहीं, बल्कि केवल मित्रता के नाते।

 

सुदामा के पास भेंट स्वरूप देने के लिए भी कुछ नहीं था। बड़ी कठिनाई से सुशीला ने घर में बचे कुछ चवल (चिउड़ा) बाँधकर उन्हें कृष्ण के लिए दे दिए।
जब वे द्वारका पहुँचे, तो श्रीकृष्ण ने उन्हें देखकर आनंद से भरकर उनके चरण धोए, उन्हें गले लगाया और राजसी सत्कार किया। यह देखकर द्वारकावासी भी चकित रह गए कि भगवान स्वयं कितने प्रेम और समानता से एक निर्धन ब्राह्मण का स्वागत कर रहे हैं।
सुदामा अपनी गरीबी का दुख न कह सके, और कृष्ण ने उनसे कुछ पूछने की आवश्यकता ही नहीं समझी—वे मित्र के मन का भाव जानते थे।
सुदामा जब लौटे, तो देखा कि उनकी कुटिया एक भव्य महल में बदल चुकी है। यही कृष्ण का प्रेम था—माँगने से पहले देने वाला प्रेम जिसे धर्म और दया की पराकाष्ठा कहा गया है।
सुदामा-कृष्ण प्रसंग यह सिखाता है कि—
* सच्ची मित्रता में धन या पद का अंतर नहीं रहता,
* देने में आनंद है, लेने में नहीं,
* भगवान भाव में निवास करते हैं, द्रव्य में नहीं।
* कृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह – करुणा और धर्म का सर्वोच्च उदाहरण
यह प्रसंग प्रायः गलत समझा जाता है। श्रीकृष्ण का 16,108 रानियों से विवाह सिर्फ एक दिव्य घटना नहीं, बल्कि धर्म, संरक्षण और मान-सम्मान** के उच्चतम सिद्धांत का उदाहरण है।

नरकासुर नामक राक्षस ने 16,100 (कभी-कभी 16,108 माना जाता है) स्त्रियों को बंदी बनाकर अपने महल में रखा था। समाज में यह मान्यता थी कि जो स्त्री किसी राक्षस की कैद में रही हो, उसे कोई स्वीकार नहीं करेगा और वे जीवनभर अपमान भोगेंगी।
जब श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया, तो वे स्त्रियाँ मुक्त होकर कृष्ण से विनती करने लगीं कि समाज उन्हें सम्मानित जीवन नहीं देगा, अतः वे उन्हें अपने संरक्षण में ले लें।
कृष्ण का दिव्य निर्णय
कृष्ण ने उन सभी को स्वीकार किया—न इच्छा से, न भोग के लिए, बल्कि उनके सम्मान और सामाजिक पुनर्स्थापन के लिए।
इतनी स्त्रियों का एक साथ संरक्षण करना ही विवाह कहलाया, क्योंकि उस समय बिना विवाह के साथ रखना धर्म के विरुद्ध था।
यह घटना बताती है—
* स्त्री की गरिमा सर्वोपरि है,
* कृष्ण कर्मयोगी थे, भोगी नहीं,
* समाज में अपमानित, शोषित और पीड़ित व्यक्तियों को नया जीवन देना ही वास्तविक धर्म है।
द्वारका का समुद्र में विलय – कृष्ण लीला का अंतिम अध्याय
महाभारत युद्ध के बाद धीरे-धीरे यदुवंश में संघर्ष और द्वेष बढ़ने लगे। श्रीकृष्ण जानते थे कि द्वापर युग समाप्ति की ओर है और कलियुग का प्रारंभ होना है।
एक दिन ऋषियों के शापवश यदुवंश में आंतरिक कलह इतना बढ़ गया कि यदुकुल स्वयं ही अपने अस्तित्व को समाप्त कर बैठा। कृष्ण ने जीवित रहते हुए ही युग-परिवर्तन का संकेत समझ लिया।
समय का बुलावा
श्रीकृष्ण प्रभास क्षेत्र में बैठे रहे और वहीं एक शिकारी ने उन्हें हिरण समझकर तीर मार दिया। कृष्ण मुस्कुराते हुए अपने दिव्य लोक को प्रस्थान कर गए।
कृष्ण के शरीर त्याग के बाद, द्वारका—जो स्वयं कृष्ण की शक्ति पर टिकी थी—धीरे-धीरे समुद्र में डूबने लगी।
समुद्र ने पूरा नगर अपनी लहरों में समेट लिया और द्वारका एक पौराणिक स्मृति बन गई।
द्वारका का समुद्र में विलय यह सिखाता है—
* संसार में कुछ भी स्थायी नहीं,
* सत्ता, वैभव, और नगर भी नश्वर हैं,
* दिव्यता व्यक्ति में रहती है, भवनों में नहीं,
* हर युग का अंत और नए युग का आरंभ एक प्राकृतिक प्रक्रिया है।
समापन – तीनों घटनाओं का सम्मिलित संदेश

इन तीनों प्रसंगों में अनेक आध्यात्मिक और मानवीय संदेश छिपे हैं—
• सुदामा प्रसंग — विनम्रता और सच्चे प्रेम की विजय
• 16,108 विवाह — करुणा, सम्मान और संरक्षण का दिव्य उदाहरण
• द्वारका का विलय — नश्वरता और युग परिवर्तन का संकेत**
श्रीकृष्ण का जीवन हमें सिखाता है कि—
* प्रेम ही धर्म है,
* करुणा ही महानता है,
* अहंकार का अंत निश्चित है,
* और जो कर्तव्य व नीति के मार्ग पर चलता है, वही जीवन को सार्थक करता है। कथा व्यास परम पूज्य विदुषी देवी भवानी ने यह सभी दृष्टांत सुनकर भक्तों के जीवन को धन्य तथा कृतार्थ कर दिया इस अवसर पर भारत नेपाल एकता तथा विश्व कल्याण के लिए सामूहिक शंखनाद कर भारत नेपाल की एकता का संदेश दिया स्वामी हरि कृष्ण महाराज ने कहा श्रीमद् भागवत महापुराण कथा जीवन कल्याण सुधा रस जिसने जीवन में एक बार ग्रहण कर लिया उसका जीवन धन्य हो जाता है इस अवसर पर निधि राणा ने कहा जिसकी भगवान में आस्था होती है उसका मानव जीवन ईश्वर कृपा से धन्य तथा सार्थक हो जाता है

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