गुरुजनों के श्री मुख से निकलने वाले पावन वचन जन्मो जन्म के संतापो का समन कर देते हैं महामंडलेश्वर श्री श्याम दास महाराज

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार ( वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद)भूपतवाला गुरुजनों के पावन वचन वास्तव में माँ गंगा की उस अविरल धारा के समान हैं, जो न केवल स्पर्श करने वाले को पवित्र करती है, बल्कि उसके जन्म-जन्मान्तर के संतापों का भी शमन कर देती है। हरिद्वार के सप्त सरोवर मार्ग पर स्थित श्री सिद्ध हनुमान गुफा की पावन ऊर्जा के बीच जब महामंडलेश्वर 1008 प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान श्री श्याम दास महाराजके श्रीमुख से यह उद्गार प्रकट हुए कि “गुरु के बिना कल्याण नहीं, मुक्ति नहीं और न ही कल्याण की कोई युक्ति है”, तो वह क्षण साक्षात ईश्वरीय साक्षात्कार के समान था। यह सत्य है कि संसार के इस गहरे भवसागर में जीव मोह-माया के भंवर में फंसा रहता है और गुरु ही वह कुशल मल्लाह हैं, जो अपनी ज्ञान रूपी नौका से हमें इस पार से उस पार ले जाते हैं। गुरु का व्यक्तित्वै केवल देह तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे उस साक्षात चैतन्य का स्वरूप होते हैं जो शिष्य के भीतर सोए हुए विवेक को जाग्रत करते हैं।गुरु और गोविंद में अभेद संबंध है, इसीलिए जब महामंडलेश्वर श्री श्याम दास महाराज जी ने “सतगुरु ही मेरे राम” का उद्घोष किया, तो उन्होंने उस परम सत्य की ओर संकेत किया जहाँ भक्त, गुरु और भगवान एक हो जाते हैं। राम का अर्थ है वह जो कण-कण में रमण करता है, और गुरु वह प्रकाश पुंज है जो हमें उस कण-कण में रमे हुए राम के दर्शन कराता है। गुरु की शरण में आते ही जीवन की दिशा और दशा दोनों बदल जाती हैं। बिना गुरु के मार्गदर्शन के साधक अध्यात्म के कठिन मार्ग पर भटक सकता है, परंतु सद्गुरु का हाथ पकड़ते ही वही मार्ग सुगम और आनंदमयी हो जाता है। वे तारणहार हैं, क्योंकि वे शिष्य के दुर्गुणों का परिमार्जन कर उसे ईश्वर की प्राप्ति के योग्य बनाते हैं

 

अंततः, गुरु की महत्ता का वर्णन शब्दों की सीमा से परे है। माँ गंगा की तरह गुरु कृपा भी पक्षपाते रहित होती है, जो भी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके चरणों में झुकता है, वह निहाल हो जाता है। महामंडलेश्वर श्री श्याम दास जी के ये वचन हमें निरंतर यह बोध कराते हैं किए जीवन की सार्थकता केवल संसार की उपलब्धियों में नहीं, बल्कि गुरु के चरणों की धूल बनकर उनके बताए मार्ग पर चलने में है। गुरु की आज्ञा और उनके द्वारा दी गई युक्ति ही वह चाबी है, जो मुक्ति के बंद द्वारों को खोल देती है और साधक को परम आनंद की प्राप्ति कराती है।

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