निस्वार्थ भक्ति ही भगवान को प्रिय, भक्त के मन के भाव तुरंत जान लेते हैं: श्री महंत रघुवीर दास महाराज
संपादक प्रमोद कुमार
हरिद्वार, 16 अप्रैल वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद। सुदर्शन आश्रम अखाड़े में आयोजित एक आध्यात्मिक सत्संग एवं प्रवचन कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति के बीच श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने भक्तजनों को संबोधित करते हुए भक्ति के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डाला। अपने श्रीमुख से अमृतमयी वाणी प्रकट करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान भक्त के मन के प्रत्येक भाव को भली-भांति जान लेते हैं, इसलिए भक्ति सदैव निस्वार्थ भाव से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जिसमें किसी प्रकार का स्वार्थ, लालच अथवा मनोकामना की अपेक्षा न हो। यदि भक्ति किसी मन्नत, इच्छा या लाभ की भावना से की जाती है, तो वह केवल एक साधन बनकर रह जाती है, जबकि वास्तविक भक्ति आत्मसमर्पण और निष्काम प्रेम का रूप होती है। भगवान केवल बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि भक्त के अंतर्मन की शुद्धता और भावनाओं को स्वीकार करते हैं। श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने आगे कहा कि मनुष्य को ईश्वर की आराधना केवल श्रद्धा, विश्वास और प्रेम के साथ करनी चाहिए। निस्वार्थ भाव से की गई भक्ति ही ईश्वर को प्रिय होती है और वही भक्त को आध्यात्मिक शांति, सुख एवं जीवन में सच्चे आनंद की प्राप्ति कराती है।
 
प्रवचन के दौरान उपस्थित श्रद्धालु महाराज श्री के प्रेरणादायी उद्गार सुनकर भावविभोर हो उठे। आश्रम परिसर भक्तिमय वातावरण, भजन-कीर्तन और जयघोष से गुंजायमान रहा। कार्यक्रम के अंत में भक्तजनों ने आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन में निस्वार्थ भक्ति के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

