गुरू ही परमात्मा का दूसरा स्वरूप हैं-महंत विंध्यवासिनी दास

हरिद्वार, 26 नवम्बर। महंत विंध्यवासिनी दास महाराज ने कहा कि गुरू ही परमात्मा का दूसरा स्वरूप है। गुरू के प्रति श्रद्धाभाव रखने और उनके दिखाए मार्ग पर चलने वाले शिष्य का हमेशा कल्याण होता है। मां विंध्यवासिनी मंदिर में आयोजित संत समागम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि गुरू से प्राप्त ज्ञान व शिक्षाओं का अनुसरण करते हुए मानव कल्याण में योगदान करना ही प्रत्येक शिष्य का कर्तव्य है। महामंडलेश्वर स्वामी प्रबोधानंद गिरी महाराज ने कहा कि समाज को ज्ञान की प्रेरणा देकर अध्यात्म के मार्ग पर अग्रसर कर सांस्कृतिक रूप से एकजुट करना ही संत समाज का उद्देश्य है। परमार्थ के लिए जीवन समर्पित करने वाले संत महापुरूषों के सानिध्य में ही भक्त का कल्याण होता है। बाबा हठयोगी व महंत दुर्गादास महाराज ने कहा कि जीवन के प्रत्येक पग पर सद्गुरू के मार्गदर्शन की आवश्यकता है। गुरू ही शिष्य के जीवन को भवसागर से पार लगाते हैं। इसलिए सभी को गुरू के प्रति श्रद्धा और विश्वास रखते हुए उनकी शिक्षाओं के अनुसार आचरण करना चाहिए। इस दौरान सभी संत महापुरूषों ने ब्रह्मलीन स्वामी हरिद्वारी दास महाराज की पुण्य तिथी पर उन्हें नमन किया और उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए सनातन धर्म संस्कृति के संरक्षण संवर्द्धन का संकल्प लिया। इस अवसर पर स्वामी शिवानंद भारती, महंत दुर्गादास, स्वामी चिदविलासानंद, स्वामी रविदेव शास्त्री, स्वामी हरिहरानंद, स्वामी दिनेश दास, महंत निर्मल दास, बाबा हठयोगी, स्वामी ऋषिश्वरानंद, महंत प्रबोधानंद गिरी सहित बड़ी संख्या में संत महंत व श्रद्धालु मौजूद रहे।