मां बनके मां को समझा है,मां आखिर मां होती है:- जागृति वशिष्ट

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प्रमोद कुमार हरिद्वार
मां बनके मां को समझा है,मां आखिर मां होती है।
हमसे पहले,हमको समझे,मां आखिर मां होती है।
नो महीने का कष्ट भुलाके,गोद मे हमको ले सोती जो।
हमको सूखा बिछोना देकर, खुद गीले मे सोती है।।
रात को जगती,लौरी सुनाती,फिर सुबह पहले जग जाती।
चोट लगे जो हमको जरा भी,मां दिल ही दिल मे रोती है।।
हर उपलब्धि पर मां को यूं लगता उसकी उपलब्धि है।
इस जग मे जो ले ले बलाए आगे बढ वो मां होती है।।
जागृति,मां सा कोई नही,मां का दर्जा रब से भी ऊंचा।
सत्य है मां के कदमो मे जन्नत,मां की दुआ न अधूरी होती है।
वरिष्ठ लेखक जागृति वशिष्ठ
 
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