19 August 2026

प्रखर तेजस्वी संत नागा बाबा महंत गजेंद्र गिरी जी महाराज ने अपने श्रीमुख से ज्ञान की वह अविरल और ओजस्वी गंगा बहाई

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार (वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद) हरिद्वार के पावन तीर्थ क्षेत्र भूपतवाला में सीवेज पंपिंग हाउस के समीप स्थित आध्यात्मिक चेतना के जीवंत केंद्र प्रसिद्ध बर्फानी कुटी में आयोजित एक भव्य एवं दिव्य सत्संग के दौरान नागा संप्रदाय के प्रखर तेजस्वी संत नागा बाबा महंत गजेंद्र गिरी जी महाराज ने अपने श्रीमुख से ज्ञान की वह अविरल और ओजस्वी गंगा बहाई जिसने उपस्थित समस्त भक्त जनों को भक्ति और वैराग्य के सागर में सराबोर कर दिया। महाराज जी ने शिव तत्व की अत्यंत गूढ़, अलौकिक और रहस्यमयी व्याख्या करते हुए अत्यंत गंभीर स्वर में उद्घोष किया कि नागा संप्रदाय साक्षात भगवान शिव का ही प्रत्यक्ष प्रतीक है और एक नागा साधु का संपूर्ण अस्तित्व महादेव की निराकार चेतना की ही प्रतिछाया होता है। उन्होंने जीवन, मृत्यु, काल और मोक्ष के सूक्ष्म त्रिकोण को समझाते हुए एक अत्यंत मारक और सत्यनिष्ठ आध्यात्मिक सूत्र दिया कि जो शव है वही वास्तव में शिव है और जो शिव तत्व है वही शव की अंतिम गति है। उनके इस कथन का दार्शनिक भाव यह था कि संसार में जिसे अज्ञानी जन मृत्यु या भयावह शव समझते हैं, वह वास्तव में शिवत्व की परम शांति में विलीन होने की एक पवित्र प्रक्रिया है क्योंकि शिव ही काल के अधिष्ठाता हैं और वही महाकाल बनकर संपूर्ण सृष्टि को अपने भीतर समाहित करते हैं। महाराज जी ने अपनी अमृतमयी वाणी से शून्य के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कहा कि शव ही शून्य है और शव ही आदि अनादि है, क्योंकि सृजन की प्रथम किरण से पूर्व भी केवल अनंत शून्य व्याप्त था और महाप्रलय के पश्चात भी केवल वही असीम शून्य शेष रहता है, और यही शून्य भगवान शिव का वह ज्योतिर्मय निराकार स्वरूप है जिसकी न कोई आदि है, न मध्य और न ही कोई अंत। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को चेताते हुए और साधना की गहराई समझाते हुए कहा कि प्रत्येक मनुष्य को इस नश्वर देह के भीतर छिपे शिवत्व को पहचानना होगा क्योंकि जिस क्षण व्यक्ति यह आत्मसात कर लेता है कि यह देह अंततः एक शव मात्र है, उसी क्षण उसके भीतर सत्य की खोज और शिव की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। नागा साधु अपने दिगंबर स्वरूप और शरीर पर धारण की गई भस्म के माध्यम से निरंतर इसी शाश्वत सत्य का उद्घोष करते हैं कि यह दृश्य जगत मिथ्या और नश्वर है जबकि केवल शिव ही एकमात्र अविनाशी और शाश्वत सत्य हैं। शून्य की महिमा का विशद वर्णन करते हुए महाराज जी ने बताया कि शून्य कोई रिक्त स्थान या अभाव नहीं है, बल्कि वह वह परम पूर्णता है जहाँ पहुँचकर जीवात्मा का परमात्मा से अद्वैत मिलन होता है और सांसारिक बंधनों का पूर्ण विच्छेद हो जाता है। महाराज जी ने नागा संप्रदाय की अत्यंत प्राचीन और गौरवशाली सैन्य परंपरा का स्मरण कराते हुए कहा कि यह संप्रदाय आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा धर्म की रक्षा हेतु स्थापित किया गया था जो राष्ट्र और संस्कृति पर आने वाले संकटों के समय सदैव अस्त्र-शस्त्र उठाकर रक्षक की भूमिका निभाता आया है। नागा साधु की साधना कोई साधारण तप नहीं बल्कि स्वयं को जीते-जी मारकर अपना पिंड दान करने की पराकाष्ठा है जहाँ साधक शीत, ग्रीष्म और भौतिक सुखों से ऊपर उठकर केवल आकाश को अपना वस्त्र और भस्म को अपना श्रृंगार बना लेता है। बर्फानी कुटी के इस अत्यंत ऊर्जावान और दिव्य वातावरण में महाराज जी के मुखारविंद से निकले ये ओजस्वी शब्द भक्तों के हृदय की गहराइयों में सीधे उतर गए और हर श्रद्धालु उस परम सत्य की अनुभूति करने लगा जिसे नागा संप्रदाय अपनी कठोर तपस्या, पंच अग्नि तप और अघोर साधना के माध्यम से युगों-युगों से सहेजता आ रहा है। महाराज जी के वचनों ने यह पूर्णतः स्पष्ट कर दिया कि आदि और अनादि की इस अनंत यात्रा में जीव जब तक स्वयं को शव की भाँति पूर्णतः समर्पित और अहंकार मुक्त नहीं करता, तब तक वह महादेव के उस परम आनंदमयी शून्य की गहराई को स्पर्श नहीं कर सकता जो इस संपूर्ण चराचर ब्रह्मांड का मूल आधार और अंतिम गंतव्य है। साधना के इस शिखर पर पहुँचकर ही साधक को यह बोध होता है कि जिसे वह शून्य समझ रहा था वही पूर्ण है और जिसे वह शव मान रहा था वही साक्षात शिव है।

 

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