यह सत्य है कि संत और महापुरुषों का जीवन स्वयं के लिए नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता के कल्याण के लिए होता है। महंत मस्त गिरी महाराज

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार (वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद) कांगड़ी स्थित गली नंबर 6 श्रीखंड कैलाश आश्रम में भक्तजनों के बीच ज्ञान की अमृत वर्षा करते हुए श्री महंत मस्त गिरी महाराज ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा गुरुदेव उस दीपक के समान हैं जो स्वयं तपकर संसार को आलोकित करते हैं। आपके भावपूर्ण शब्दों को आधार बनाकर, यहाँ सद्गुरु की महिमा पर एक विस्तृत लेख प्रस्तुत है:

 

सद्गुरु महिमा: भवसागर से तारने वाली दिव्य शक्ति

भारतीय संस्कृति और आध्यात्मिकता के आकाश में संत और सद्गुरु वे ध्रुवतारे हैं, जो भटकती हुई मानवता को सही दिशा दिखाते हैं। कहा गया है कि “परहित सरिस धर्म नहिं भाई”—अर्थात दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है। संतों का तो अस्तित्व ही परोपकार के लिए होता है। समाज को समर्पित जीवन

एक सामान्य व्यक्ति का जीवन ‘स्व’ (स्वयं) के इर्द-गिर्द घूमता है, किंतु एक महापुरुष का जीवन ‘सर्व’ (सबके लिए) होता है। जिस प्रकार वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता और नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं, उसी प्रकार संतों का ज्ञान, उनकी तपस्या और उनका समय केवल जगत कल्याण के लिए समर्पित होता है। वे समाज की बुराइयों को अपने भीतर सोख लेते हैं और बदले में केवल प्रेम, करुणा और सद्मार्ग प्रदान करते हैं। सद्गुरु ही तारणहार हैं

संसार को एक ‘भवसागर’ माना गया है, जहाँ मोह, माया, लोभ और अहंकार की लहरें जीव को डुबोने का प्रयास करती हैं। इस अथाह सागर में सद्गुरु एक कुशल नाविक (खेवटिया) की भूमिका निभाते हैं। श्री महंत मस्त गिरी महाराज ने कहा

अंधकार से प्रकाश की ओर: ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। जो अज्ञान के अंधेरे को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैला दे, वही गुरु है।

भवपार उतारने वाले: वे हमें सांसारिक बंधनों से मुक्त कराकर मोक्ष या आत्म-साक्षात्कार के तट पर पहुँचाते हैं। इसीलिए उन्हें ‘तारणहार’ कहा गया है। “सद्गुरु ही मेरे राम” अध्यात्म में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है, क्योंकि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग गुरु ही बताते हैं। जब भक्त कहता है कि “सद्गुरु ही मेरे राम,” तो वह स्वीकार करता है कि परमात्मा का साकार रूप उसके गुरु में ही विद्यमान है। कबीर दास जी ने ठीक ही कहा है: “गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय। गुरु की वाणी ही मंत्र है और गुरु की सेवा ही साक्षात् राम की सेवा है। उनके चरणों में ही चारों धाम का सुख समाहित होता है अपार महिमा और जगत कल्याण सद्गुरु के प्रत्येक कार्य में, चाहे वह मौन हो या प्रवचन, केवल लोक-मंगल की भावना छिपी होती है। वे अपनी कृपा दृष्टि से पापी को पावन और अज्ञानी को ज्ञानी बना देते हैं। उनकी महिमा का वर्णन शब्दों में करना असंभव है। यदि पूरी पृथ्वी को कागज, सात समुद्रों को स्याही और सभी वनों को कलम बना लिया जाए, तब भी गुरु की महिमा का गुणगान पूरा नहीं हो सकता। सद्गुरु केवल एक शरीर नहीं, बल्कि एक जाग्रत चेतना हैं। जो सौभाग्यशाली जीव गुरु की शरण में चला जाता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। वे हमें सिखाते हैं कि कैसे इस संसार में रहते हुए भी इससे निर्लिप्त रहा जाए और कैसे अपने जीवन को सार्थक बनाया जाए। महंत मस्त गिरी महाराज ने कहा

“सद्गुरु की शरण में आकर ही मन को शांति और आत्मा को गंतव्य मिलता है।”पंचम वार्षिक कार्यक्रम तथा श्री राम चरित्र मानस पाठ का आयोजन 5 मार्च 2026 से आरंभ है

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