गुरु कृपा से ही संभव है जीवन का नव-अभ्युदय प्रातः स्मरणीय गुरु भगवान महामंडलेश्वर श्री राम मुनि महाराज
हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानंद प्रातः स्मरणीय महामंडलेश्वर परम पूज्य गुरुदेव श्री राम मुनि जी महाराज ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा गुरु को साक्षात परब्रह्म का स्वरूप माना गया है। वह केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वह तत्व हैं जो अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। हाल ही में धर्मनगरी हरिद्वार के प्रतिष्ठित श्री संत मंडल आश्रम में एक आध्यात्मिक उत्सव का आयोजन हुआ, जहाँ ज्ञान की ऐसी ही कल्याणकारी अमृत वर्षा हुई। यह आयोजन प्रातः स्मरणीय, अनंत विभूषित, आचार्य महामंडलेश्वर, ब्रह्मलीन 1008 स्वामी जगदीश मुनि जी महाराज की पतित पावन स्मृति को समर्पित था। इस भावपूर्ण संत समागम में देश के कोने-कोने से आए संतों और भक्तों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। महामंडलेश्वर श्री राम मुनि जी महाराज का पावन संदेश कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण और मार्गदर्शक प्रातः स्मरणीय अनंत विभूषित 1008 महामंडलेश्वर श्री राम मुनि जी महाराज रहे। उन्होंने अपने श्रीमुख से गुरु महिमा का बखान करते हुए भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। महाराज जी ने बड़ी ही सरलता और गहराई से यह स्पष्ट किया कि भक्ति मार्ग ही कल्याण का वास्तविक मार्ग है।
 
उनके उद्बोधन के मुख्य बिंदु यहाँ दिए गए हैं: भाग्य का उदय और गुरु कृपा: महाराज जी ने कहा कि जब मनुष्य के पूर्व जन्मों के पुण्य संचित होते हैं, तब उसे किसी तत्वदर्शी गुरु का सानिध्य प्राप्त होता है। गुरु के मुख से निकले शब्द मनुष्य के सोए हुए भाग्य को जगाने की क्षमता रखते हैं। अमृत वर्षा और ज्ञान का संचार: जिस प्रकार वर्षा सूखी धरती को हरा-भरा कर देती है, वैसे ही गुरु के ज्ञान की अमृत वर्षा शिष्यों के हृदय के संशय और विकारों को धोकर उसे भक्ति के योग्य बनाती है।
भक्ति ही परम मार्ग है: उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि इस कलयुग में ईश्वर प्राप्ति और आत्म-कल्याण का सबसे सुलभ मार्ग ‘भक्ति’ है। बिना श्रद्धा और समर्पण के ज्ञान केवल बोझ है, लेकिन भक्ति के साथ मिलकर वही ज्ञान मुक्ति का द्वार बन जाता है।
श्री संत मंडल आश्रम: श्रद्धा और साधना का केंद्र
स्वामी जगदीश मुनि जी महाराज की स्मृतियों को संजोए यह आश्रम आज भी अध्यात्म की मशाल जलाए हुए है। समागम के दौरान पूरा वातावरण ‘गुरुदेव’ के जयघोष से गुंजायमान रहा। उपस्थित भक्तों ने अनुभव किया कि गुरु भले ही भौतिक देह में हमारे सम्मुख न हों, परंतु उनकी शिक्षाएं और उनकी सूक्ष्म उपस्थिति सदैव हमारा मार्गदर्शन करती रहती हैं।”गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष। गुरु बिन लखे न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष॥” इस संत समागम ने यह सिद्ध कर दिया कि संसार की भौतिक चकाचौंध के बीच आज भी शांति और मोक्ष की तलाश गुरु के चरणों में ही समाप्त होती है। महामंडलेश्वर श्री राम मुनि जी महाराज के वचनों ने भक्तों के हृदय में भक्ति का नया संचार किया और उन्हें जीवन जीने की एक नई दृष्टि प्रदान की।

