22 October 2026

भारतीय संस्कृति के रंगों से सजेगा 52वाँ अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार, 22 अक्टूबर। भारतीय ज्ञान-परंपरा, वैदिक चिंतन और देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को एक सूत्र में पिरोने जा रहे 52वें अखिल भारतीय प्राच्य विद्या सम्मेलन का काउंटडाउन शुरू हो गया है। आगामी 29 से 31 अक्टूबर 2026 तक पतंजलि विश्वविद्यालय, हरिद्वार में आयोजित होने वाले इस त्रिदिवसीय सम्मेलन को दिव्य, भव्य और यादगार बनाने के लिए तैयारियाँ अब अंतिम चरण की ओर बढ़ रही हैं। जहाँ एक ओर सम्मेलन की शैक्षणिक एवं व्यवस्थागत तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से भारत की विविधतापूर्ण कला, संगीत और नृत्य परंपराओं को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने की व्यापक तैयारियाँ चल रही हैं।

 

सम्मेलन की तैयारियों को गति देने के लिए पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया जी निरंतर व्यवस्थाओं का निरीक्षण कर रही हैं। वे विभिन्न समितियों के समन्वयकों से तैयारियों की प्रगति की जानकारी लेकर आवश्यक दिशा-निर्देश दे रही हैं, ताकि सम्मेलन में देश-विदेश से आने वाले विद्वानों, शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों को सुव्यवस्थित और गरिमामय वातावरण प्राप्त हो सके। आयोजन के प्रत्येक पक्ष को भारतीय संस्कृति, परंपरा और आतिथ्य के अनुरूप प्रस्तुत करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

 

*सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में साकार होगी भारत की विविधता*

सम्मेलन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है। इसी क्रम में साध्वी डॉ. देवप्रिया जी ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ देने वाले विद्यार्थियों तथा संगीत एवं नृत्य के आचार्यों के साथ बैठक कर तैयारियों की समीक्षा की। उन्होंने निर्देशित किया कि सांस्कृतिक कार्यक्रम केवल मनोरंजन तक सीमित न रहें, बल्कि भारत की गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत, लोकजीवन, आध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय एकात्मता का प्रभावशाली परिचय भी प्रस्तुत करें।

उन्होंने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधता में निहित एकता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों की भाषा, वेशभूषा, संगीत, नृत्य और लोकपरंपराएँ अपनी विशिष्ट पहचान रखते हुए भी भारतीय संस्कृति की एक अखंड धारा का प्रतिनिधित्व करती हैं। इसलिए सम्मेलन के सांस्कृतिक मंच पर विभिन्न राज्यों की विशिष्ट संगीत एवं नृत्य शैलियों को स्थान दिया जाए, जिससे उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों को भारत की सांस्कृतिक समृद्धि का व्यापक अनुभव प्राप्त हो सके।

 

*लोककला, शास्त्रीय परंपरा और भारतीय अस्मिता का संगम*

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी में विद्यार्थी, संगीत विशेषज्ञ और नृत्य आचार्य उत्साहपूर्वक जुटे हुए हैं। प्रस्तुतियों के चयन, अभ्यास, मंचीय संयोजन और कार्यक्रमों की रूपरेखा को व्यवस्थित किया जा रहा है। भारतीय शास्त्रीय संगीत, नृत्य तथा विभिन्न क्षेत्रों की लोककलाओं और पारंपरिक प्रस्तुतियों से सम्मेलन का वातावरण ज्ञान, संस्कृति, कला और आध्यात्मिक चेतना के सुंदर समन्वय से परिपूर्ण बनेगा।

पतंजलि विश्वविद्यालय में सम्मेलन की तैयारियाँ अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी हैं। आयोजन को लेकर विद्यार्थियों, आचार्यों और विभिन्न समितियों में विशेष उत्साह है। आगामी दिनों में तैयारियों को और गति देते हुए सम्मेलन को ऐसा स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है, जिसमें भारतीय प्राच्य विद्या की बौद्धिक समृद्धि के साथ भारत की सांस्कृतिक आत्मा के भी भव्य दर्शन हों।

 

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