भागवत कृपा के बिना भक्ति संभव नहीं और बुद्धि के बिना विकास संभव नहीं श्री महंत कमलेशानन्द सरस्वती

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प्रमोद कुमार सम्पादक

हरिद्वार (समाचार माध्य वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज कुमार) खड़खड़ी स्थित श्री गंगा भक्ति आश्रम में भक्तजनों के बीच ज्ञान की वर्षा करते हुए आश्रम के श्री महंत परम पूज्य कमलेशानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा जब तक भगवान की कृपा नहीं होती तब तक भक्ति प्राप्त नहीं होती और जब तक मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता तब तक उसका जीवन अंधकार मय होता है वह शिक्षित होने के बावजूद भी अज्ञानता के भवर में फंसा रहता है कहने का तात्पर्य यह है जब तक आपको चोट नहीं लगेगी तब तक आपको दूसरे के दुख दर्द का एहसास नहीं होगा और ऐसा तभी संभव है जब मनुष्य हर चीज का अनुभव करें और अनुभव मनुष्य को क्रियाशील बनता है अगर मनुष्य धर्म ग्रंथो का अध्ययन भी कर लेता है तो यह जरूरी नहीं कि वह धर्माचार्य हो गया हो क्योंकि हो सकता है उसने सिर्फ उस क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण की हो या कुछ धर्म ग्रंथो का पुस्तकों का अध्ययन किया हो जिसके बल पर वह कुछ धर्म कर्म की बातें कर सकता हो किंतु उसकी बुद्धि और उसके संस्कार एक अशिक्षित व्यक्ति जैसे हो वह अंधकार के भवर में डूबा हो शिक्षा लेना या किसी क्षेत्र में अध्ययन करना उसे बुद्धिमानी नहीं कहलाता उसे बुद्धिमान नहीं बना देता इसके लिए आपको बुद्धिमानों की संगत ग्रहण करनी होती है उनके बताए मार्ग पर चलना होता है बुद्धि का विकास एक-दो दिन में नहीं हो जाता इसके लिए गुरुजनों की लंबे समय तक संगत ग्रहण करनी पड़ती है उनके हर आदेश का पालन करना पड़ता है लेकिन इस डगर पर सिर्फ वही लोग चल सकते हैं जिनके लिए गुरु वचन पत्थर की लकीर होते हैं अन्यथा अज्ञानी मूर्ख व्यक्ति गुरु के वचनों को भी तर्क वितर्क में ले जा सकता है और उसे अपने जी का जंजाल बना सकता है इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति के सामने तर्क सही है किंतु अज्ञानी मूर्ख व्यक्ति के सामने तरक करना कुतर्क हो के सामान हो सकता है वह आपको भी अपने अज्ञानता अहंकार घमंड तथा मंदबुद्धिता के भवर में धकेल सकता है इसलिए शिक्षा हमेशा उसी को दें जो उसके योग्य हो जो उसे समझ सकता हो जो उस मार्ग पर चल सकता हो अन्यथा भैंस के सामने बीन बजाने के सामान आपका ज्ञान हो सकता है इस संसार में कुछ भी गलत नहीं सभी सृष्टि के अनुरूप है सिर्फ उसका तरीका गलत हो सकता है उसके चलने का ढंग गलत हो सकता है उसके उपयोग करने का मार्ग तरीका गलत हो सकता है किंतु जो किसी मार्ग के चलने पर अथवा उपयोग पर तरक कुतर्क वितर्क करता हो वह अज्ञानी हो सकता है अज्ञानता के भवर में डूबा हो सकता है अथवा कुछ गलत बातों की संगत के वसीभूत हो सकता है जिस प्रकार ज्ञान मनुष्य के मन मस्तिष्क में बसे अंधकार को दूर करता है इसी प्रकार संस्कार और अच्छी संगत अच्छे लोगों के साथ उठ बैठ उसकी बुद्धि का विकास करते हैं किंतु कोई ना कोई विकार सभी में बसा होता है कुछ विकार को भी मार्ग बनाया जा सकता है जो सही व्यक्ति है वह कभी ज्यादा मीठा नहीं बोलता जो सही मार्ग पर चलता है वह दूसरों से बहस नहीं करता तथा दूसरों को सही गलत की शिक्षा नहीं देता बल्के उसकी शिक्षा दूसरे के सारे जीवन को परिवर्तित कर देती है जो इस संसार में आया है वह सभी जीवन के सांसारिक भोगों को भोगते हुए जो भागवत कृपा प्राप्त कर ले वह इस संसार में सबसे बड़ा प्रतिभा का धनी है किसी भी प्रलोभन से मुक्त जीवन मनुष्य को सद्मार्ग की ओर ले जाता है किंतु जिसके मन मस्तिष्क में किसी काम के माध्यम से जीविका का साधन उसका माध्यम हो उसे कर्म क्षेत्र से जोड़कर देखना चाहिए धर्म सिर्फ उसका कार्य है वह धर्म के मार्ग से अपना जीवन यापन कर रहा है कथा भागवत आदि का उपयोग धर्म और समाज कल्याण के लिए होना चाहिए जो इसे बिजनेस बनता है या धन का माध्यम बनता है इसका अर्थ यह है कि वह धर्म के मार्ग पर खुद नहीं वह दूसरे को क्या धर्म के मार्ग पर ले जाएगा और क्या धर्म का मार्ग दिखायेगा हां इतना जरूर है की अगर आप अपने घर में किसी ब्राह्मण या किसी योगी से कथा पूजा पाठ यज्ञ करा रहे हैं तो उसके कर्म परिश्रम स्वरूप उसे दक्षिण दिया जाना धर्म के अनुरूप है शास्त्र अनुरूप है किंतु उसे कमाई का माध्यम बनाना उचित नहीं पाप के मार्ग पर चलना है सांसारिक जीवन में रहते हुए सभी भोगों को भोगते हुए जो अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहान करें अपने घर में यज्ञ अनुष्ठान कराये अथवा समाज कल्याण के लिए कार्य करें ऐसे व्यक्तियों पर ऐसे समाज पर सदैव ईश्वरीय कृपा बरसती है

 

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