17 August 2026

मनुष्य की जागृत चेतना से ही विश्व शांति की स्थापना- आचार्य बालकृष्ण

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प्रमोद कुमार सम्पादक

हरिद्वार पतंजलि विश्वविद्यालय के दर्शन एवं संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान में ‘विश्व शांति में भारतीय दर्शनों का योगदान’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता कुलपति श्रद्धेय आचार्य श्री बालकृष्ण जी ने की। मुख्य संरक्षिका प्रो. साध्वी देवप्रिया और मुख्य अतिथि राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरूपति के प्रो-नारायण पी. तथा विशिष्ट अतिथि हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली की डॉ. अनीता राजपाल और गुरूकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की डॉ बबीता शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये।
इस अवसर पर आचार्य श्री ने कहा कि वर्तमान समय में युद्ध जैसी विभीषिका क्रोध और अवसाद जैसी समस्यायें उत्पन्न हो रही है जिसका कारण भारतीय ऋषि-मुनियों के ज्ञान से समस्त संसार का अवगत नही होना है, अतः विश्व शांति के लिए सभी को भारतीय दर्शन से अवगत होना अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य के अंदर यदि अशांति व्याप्त है तो वह केवल मनुष्य ही नही बल्कि उसकी समस्त परिधि को अशांत करती है। मनुष्य के अंदर स्वयं की शांति होने से ही वह शांतिपूर्ण परिवार और समाज का निर्माण करता है, जिसके क्रमिक विकास से राष्ट्र और विश्व में शांति स्थापित होती है। प्रत्येक मनुष्य यदि भारतीय दर्शन परम्परा के अनुरुप जीवन जीना प्रारम्भ कर दे तो विश्व अपने आप ही शांतिमय बन जायेगा।
मुख्य अतिथि प्रो. नारायण पी. ने कहा कि वर्तमान में विश्व अशांत है इसलिए हम आज विश्व शांति हेतु भारतीय दर्शनों की उपयोगिता पर विचार कर रहे है। उन्होंने बताया कि मनुष्य इसीलिए कष्ट में है क्योंकि वह संगति में लीन है यहाँ संगति कई बार कष्ट का हेतु बन जाता है, जैसे हम किसी चीज को अपना मानते हैं तो उसको हुआ कष्ट हमें प्रतीत होने लगता है। इसीलिए हमें असंगत का आश्रय लेना चाहिए असंगत (अ = परमात्मा) अर्थात् परमात्मा से संगति। परमात्मा की संगति से हमारे अंदर अभिमान नहीं रहेगा। उपनिषदों में वर्णित है कि परमात्मा ने ही समस्त सृष्टि की रचना की है और उसमें प्रविष्ट हो गये हैं, अतः यदि हम सम्पूर्ण सृष्टि को परमात्मा स्वरूप अनुभव करें तो हम सुख-दुख से प्रभावित नही होंगे। उन्होने यह भी कहा कि विश्व शांति के निमित्त हमें परमात्मा में तीन तत्वो यथा द्रव्य, ज्ञान और कर्म का समर्पण आवश्यक है। परमात्मा में इनके अर्पण से मानसिक और वैश्विक शांति स्थापित होगी।
संगोष्ठी में हिन्दू महाविद्यालय की प्रो- अनीता राजपाल जी ने योगदर्शन से लेकर वेद, उपनिषद, मनुस्मृति, जैन एवं बौद्ध दर्शन आदि के अनेक संदर्भो को उजागर करते हुए मैत्री, करूणा, मुदिता एवं उपेक्षा आदि पर विशद व्याख्यान दिया जिसमे परस्परता के साथ-साथ विश्व शांति का संदेश निहित है। वही डॉ. बबीता शर्मा ने विश्व शांति में भारतीय अहम दर्शनों की भूमिका पर विशद् प्रकाश डाला।
संगोष्ठी में पोस्टर प्रदर्शनी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें प्रथम स्थान दर्शन विभाग की झरना व शोध छात्र लिकेश्वर द्वितीय स्थान स्वामी भवदेव, शिव कैलाश व वरदान तथा तृतीय स्थान स्वामी विज्ञानदेव, पुनीता, रूपल व स्वामी वीरथदेव ने प्राप्त किया।
इस संगोष्ठी में प्रति-कुलपति प्रो- मंयक अग्रवाल, ओडीएल के निदेशक प्रो. सत्येन्द्र मित्तल, कुलसचिव डॉ. प्रवीण पूनिया, डॉ. मनोहर लाल आर्य, डॉ. स्वामी परमार्थदेव, स्वामी आर्षदेव, प्रो. के.एन.एस. यादव, प्रो. ए.के.सिंह, प्रो. ओमनारायण तिवारी, डॉ. गणेश पाड्ंया, डॉ. प्रज्ञानदेव, डॉ.सांवर सिंह, डॉ. वैशाली, डॉ. अलका, डॉ. भागीरथी आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन डॉ गौतम आर. और संयोजन आचार्य बद्रीनाथ बल्लेरी ने किया।

 

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