बिना भगवान की कृपा के ईश्वर की भक्ति प्राप्त नहीं हो सकती और भगवान कृष्ण को प्राप्त करने के लिये माता राधा की शरणागत होना पड़ता है कथा व्यास बाल विदुषी देवी भवानी

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संपादक प्रमोद कुमार

हरिद्वार प्रेम नगर आश्रम रानीपुर मोड़ में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में आज कथा व्यास परम पूज्य बाल विदुषी देवी भवानी ने कहाश्रीमद्भागवत कथा में भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी का विवाह प्रसंग अत्यंत कोमल, मधुर और भक्ति से परिपूर्ण माना गया है। विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी बचपन से ही कृष्ण को अपने हृदय में पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं, और जैसे-जैसे समय बीतता गया, उनका प्रेम दृढ़ भक्ति में बदलता गया। किंतु भाग्य ने एक चुनौती उनके सामने रख दी—भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से निश्चित कर दिया। यह समाचार सुनकर रुक्मिणी जी का हृदय श्रीकृष्ण के प्रति और अधिक तड़प उठा। उन्होंने अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर एक अमर पत्र लिखा और ब्राह्मण के हाथों द्वारका भेजा। इस पत्र में उन्होंने प्रभु को पुकारते हुए लिखा—“त्वां दुहिन्धे पुरुषं नित्यमात्मनः, त्वां श्रीनिवासं श्रितकामा मनस्विनी”—हे कृष्ण, मैं आपको ही अपने जीवन का नित्य स्वामी मान चुकी हूँ, मुझे अपने चरणों में स्थान दीजिए। समर्पण से भरे इस निवेदन ने भगवान के हृदय में प्रेम की लहर जगा दी और वे तत्काल रथ पर आरूढ़ होकर विदर्भ के लिए चल पड़े।इधर रुक्मिणी जी विवाह-पूर्व दिवस पर गिरिजा मंदिर जाकर पूजा कर रही थीं। उनकी भक्ति, सौम्यता और तप के तेज से मंदिर का वातावरण स्वयं आनंदमय हो उठा था। जैसे ही वे पूजा समाप्त करके बाहर निकलीं, श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ पर बिठा लिया। यह दृश्य अपहरण जैसा प्रतीत होता है, पर वास्तव में यह प्रेम का दिव्य स्वीकार था, क्योंकि रुक्मिणी के हृदय को हरने वाले स्वयं “हरि” ही आए थे। भागवत में कहा गया—“सा कृष्णमारुरोहाथ हरन्तं हृदयं हरिः”—रुक्मिणी उस कृष्ण के रथ पर चढ़ीं जो पहले ही उनके मन को हर चुके थे। रुक्मी और अन्य राजाओं ने पीछा किया, पर बलराम जी के पराक्रम के आगे वे टिक न सके। कृष्ण रुक्मिणी को सुरक्षित द्वारका ले आए जहाँ देवताओं की पुष्पवृष्टि, शंखनाद, स्त्रियों के मंगलगीत और दीपों की उज्ज्वल ज्योति से पूरा नगर स्वर्ग के समान प्रकाशमान था।विवाह के समय वातावरण में ऐसी मधुरता छाई थी मानो स्वयं प्रकृति भी इस दिव्य मिलन पर मुस्कुरा रही हो। रुक्मिणी जी का सौभाग्य, श्रीकृष्ण की कोमल मुस्कान और सभागार में व्याप्त प्रेम की सुगंध से उस दिन द्वारका का प्रत्येक कण धन्य हो उठा। भागवत इस मंगल उत्सव के बारे में कहता है—“ततो विवाहो भगवान् मुदा लोकं प्रपौरयत्”—तब भगवान का विवाह ऐसा हुआ कि आनंद से सभी लोक भर गए। यह विवाह केवल दो आत्माओं का नहीं, बल्कि भक्ति और करुणा के मिलन का पर्व था। रुक्मिणी का समर्पण और कृष्ण का उत्तर सदा के लिए भक्त और भगवान के मधुर संबंध का प्रतीक बन गया। आज भी कथा में यह प्रसंग सुनते ही मन भाव-विह्वल हो जाता है, हृदय में अलौकिक दिव्यता उतर आती है और अंतर्मन यही कह उठता है—“कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।” सुंदर भजन सुनकर तथा भगवान श्री कृष्णा माता रूकमणि के विवाह का दृष्टांत सुनकर भक्त भक्ति मय होकर नाचने झूमने गाने लगे ऐसा लग रहा था जैसे साक्षात भगवान श्री कृष्णा और माता रूकमणि के विवाह का वह क्षण देखने के हम साक्षी बना रहे हैं इस अवसर पर बोलते हुए श्री हरि कृपा फाऊंडेशन के संस्थापक परम तपस्वी परम विद्वान प्रातः स्मरणीय श्री हरि कृष्ण महाराज ने कहा जिसके मन में भक्ति वास कर लेती है उसके हृदय में भगवान खुद आकर बस जाते हैं किंतु यह बात भी सत्य है कि बिना भगवान की कृपा कि उनकी भक्ति प्राप्त हो पाना असंभव है जिस पर भगवान कृपा करते हैं भक्ति स्वयं उसके हृदय में वास कर लेती है और उसका जीवन भक्ति मय हो जाता है भक्ति की सुगंध से उसका संपूर्ण जीवन चरित्र जगमगा उठता है इस अवसर परश्रीमती निधि राणा शिवानी उपाध्याय शेखर शर्मा सुधा राठोर स्वामी विषेशानंद सहित भारी संख्या में श्रोता तथा भक्तगण उपस्थित थे जिन्होंने श्री कृष्ण विवाह की सुंदर महिमा का गुणगान सुन अपने जीवन को धन्य तथा कृतार्थ किया

 

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