मन में शुद्ध विचार और मस्तिष्क का स्वस्थ होना अति आवश्यक है और मन में आने वाले विकारों को गुरुजनों के सद्व विचार और कल्याणकारी वचन ही शुद्ध कर सकते हैं-श्रीमहंत श्याम सुंदर दास
प्रमोद कुमार सम्पादक
हरिद्वार (मनोज ठाकुर)17 नवंबर 2024 श्यामपुर स्थित श्याम वैकुंठ धाम में अपने श्री मुख से उद्गार व्यक्त करते हुए श्री महंत परम पूज्य श्यामसुंदर दास जी महाराज ने कहा अगर आपके मन में किसी के प्रति अच्छे भाव आए तो उसके मन में भी आपके प्रति अच्छे भाव ही आएंगे लेकिन आपके मन में उसके प्रति गलत भाव आते हैं तो उसके मन में भी आपके प्रति गलत भाव आएंगे सारा खेल विचारों और मन के भावों का है मन में शुद्ध विचार और मस्तिष्क का स्वस्थ होना अति आवश्यक है और मन में आने वाले विकारों को गुरुजनों के सद्व विचार और कल्याणकारी वचन ही शुद्ध कर सकते हैं चेहरे पर हमेशा मुस्कान विचारों में शुद्धता और दूसरों के प्रति अच्छी सोच ही आपके जीवन की सार्थकता का माध्यम बनती है हमारे पुराने आचार्यों विचार सभ्यता और संस्कृति हमें संस्कारों में रहना सिखाती है
 
एक बार श्रीकृष्ण हस्तिनापुर महल की राज सभा में बैठे हुए थे। उन्होने कौरवों के राजकुमार दुर्योधन को अपने पास बुलाया और एक कीमती हीरों की पोटली देकर कहा इस सभा में जो भी तुमको श्रेष्ठ लगेउन सभी में यह हीरे बाँट दो।
दुर्योधन हीरे लेकर सारी सभा में घूमने लगा। घूम कर वापस आकर हीरो की पोटली श्रीकृष्ण को वापिस करके बोला इस सभा में कोई भी श्रेष्ठ नहीं है।
श्रीकृष्ण मुस्कुराये और फिर वही पोटली पांडवों के ज्येष्ठ राजकुमार युधिष्ठिर को देकर बोले इस सभा में जो भी तुमको श्रेष्ठ लगे उसमे यह हीरे बाँट दो।
युधिष्ठिर हीरो की पोटली लेकर सभा का चक्कर लगा कर वापिस आ गए। आकर श्रीकृष्ण से कहने लगे भगवन् आपने बहुत कम हीरे दिए हैं। यहाँ पर तो एक से एक श्रेष्ठ लोग बैठे हुए है।
इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि
एक और कहानी से इसे समझते हैं
एक बार एक राजा की सभा में एक चंदन के बहुत बड़े व्यापारी ने प्रवेश किया। राजा की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसे देखते ही अचानक उनके मन में विचार आया कि कुछ ऐसा किया जाए ताकि इस व्यापारी की सारी संपत्ति राजकोष में जमा कर दी जाए। व्यापारी जब तक वहां रहा राजा का मन रह रहकर उसकी संपत्ति को हड़प लेने का करता। कुछ देर बाद व्यापारी चला गया।
उसके जाने के बाद राजा को अपने राज्य के ही एक निवासी के लिए आए ऐसे विचारों के लिए बड़ा खेद होने लगा।
राजा ने सोचा कि मैं तो प्रजा के साथ न्यायप्रिय रहता हूं। आज मेरे मन में ऐसा कलुषित विचार क्यों आया
उन्होंने अपने मंत्री से सारी बात बताकर समाधान पूछा। मन्त्री ने कहा इसका उत्तर देने के लिए आप मुझे कुछ समय दें। राजा मान गए।
मंत्री विलक्षण बुद्धि का था। वह इधरउधर के सोचविचार में समय न खोकर सीधा व्यापारी से मैत्री गाँठने पहुंचा।
व्यापारी से मित्रता करने के बाद उसने पूछा मित्र तुम चिन्तित क्यों हो भारी मुनाफे वाले चन्दन का व्यापार करते होफिर चिंता कैसी
व्यापारी बोला मेरे पास उत्तम कोटि के चंदन का बड़ा भंडार जमा हो गया है। चंदन से भरी गाडियां लेकर अनेक शहरों के चक्कर लगाए पर नहीं बिक रहा है। बहुत धन इसमें फंसा पडा है। अब नुकसान से बचने का कोई उपाय नहीं है।
व्यापारी की बातें सुनकर मंत्री ने पूछा क्या हानि से बचने का कोई उपाय नहीं
व्यापारी हंसकर कहने लगा- अगर राजा की मृत्यु हो जाए तो उनके दाह-संस्कार के लिए सारा चन्दन बिक सकता है। अब तो यही अंतिम मार्ग दिखता है।
व्यापारी की इस बात से मंत्री को राजा के उस प्रश्न का उत्तर मिल चुका था जो उन्होंने व्यापारी के संदर्भ में पूछा था।
मंत्री ने कहा तुम आज से प्रतिदिन राजा का भोजन पकाने के लिए चालीस किलो चन्दन राजरसोई भेज दिया करो। पैसे उसी समय मिल जाएंगे।
व्यापारी यह सुनकर बड़ा खुश हुआ। प्रतिदिन और नकद चंदन बिक्री से तो उसकी समस्या ही दूर हो जाने वाली थी। वह मन ही मन राजा के दीर्घायु होने की कामना करने लगा ताकि राजा की रसोई के लिए चंदन लंबे समय तक बेचता रहे।
एक दिन राजा अपनी सभा में बैठे थे। वह व्यापारी दोबारा राजा के दर्शनों को वहां आया। उसे देखकर राजा के मन में विचार आया कि यह कितना आकर्षक व्यक्ति है। इसे कुछ पुरस्कार स्वरूप अवश्य दिया जाना चाहिए।
राजा ने मंत्री से कहा- यह व्यापारी पहली बार आया था तो उस दिन मेरे मन में कुछ बुरे भाव आए थे और मैंने तुमसे प्रश्न किया था। आज इसे देखकर मेरे मन के भाव बदल गए। इसे दूसरी बार देखकर मेरे मन में इतना परिवर्तन कैसे हो गया
मन्त्री ने उत्तर देते हुए कहा- महाराज! मैं आपके दोनों ही प्रश्नों का उत्तर आज दे रहा हूं। यह जब पहली बार आया था तब यह आपकी मृत्यु की कामना रखता था। अब यह आपके लंबे जीवन की कामना करता रहता है।
इसलिए आपके मन में इसके प्रति दो तरह की भावनाओं ने जन्म लिया है। जैसी भावना अपनी होती है, वैसा ही प्रतिबिम्ब दूसरे के मन पर पडने लगता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है।
हम किसी व्यक्ति का मूल्यांकन कर रहे होते हैं तो उसके मन में उपजते भावों का उस मूल्यांकन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
इसलिए जब भी किसी से मिलें तो एक सकारात्मक सोच के साथ ही मिलें। ताकि आपके शरीर से सकारात्मक ऊर्जा निकले और वह व्यक्ति उस सकारात्मक ऊर्जा से प्रभावित होकर आसानी से आप के पक्ष में विचार करने के लिए सारा खेल मनुष्य के विचारों का है अगर विचारों में शुद्धता है तो मन मस्तिष्क शुद्ध रहेगा दूसरों के प्रति भी स्वस्थ सो पाएंगे तथा स्वस्थ भविष्य का निर्माण करने में पथिक सिद्ध होंगे।

