आस्था और भक्ति भाव से ही ईश्वर प्रसन्न होते हैं श्री महंत श्यामसुंदर दास महाराज
सम्पादक प्रमोद कुमार
हरिद्वार 21 फरवरी 2025 (वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोज मनोजानन्द) भगवान हरि मनुष्य के मन में बसे भक्ति भाव को देखते हैं भगवान किसी प्रलोभन या किसी प्रकार के चढ़वे के भूखे नहीं होते भगवान तो सच्ची आस्था और भक्त के मन में बसे भक्ति भाव से ही प्रसन्न हो जाते हैं जिस प्रकार चिंता और चीता मे सिर्फ एक बिंदी का अंतर होता है किंतु चिंता मनुष्य को ताउम्र लगी रहती है और वह उसी में ही खोया रहता है और चीता मनुष्य के अंतिम समय के सफर का पहला पड़ाव है कहने का तात्पर्य यह है की जन्म के समय मनुष्य मिठाई बांटते हैं खुशियां मानते हैं और मृत्यु के समय थोड़ा सा स्वरूप बदल जाता है 13वी में मिठाई की जगह लड्डू और खीर बनाते हैं कहने का मतलब यह है कि यह मनुष्य कभी चुकता नहीं खुशी में भी मिठाई खा रहा है और मृत्यु के बाद 13वीं में भी खीर और लड्डू रूपी मिठाई खा रहा है खाने में यह नहीं हुआ की मृत्यु के समय कड़वा खा ले या फीका खा ले किंतु किसके लिये सिर्फ समर्पण भाव के लियें जन्म हुआ मिठाई बनी और खाई गई वह जन्मे नये शिशु के प्रति खुशी उदार भाव है और दूसरी तरफ मृत्यु हुई तेहरवी13वीं का आयोजन हुआ तो मरने वाले के प्रति उस अंतिम भोग के रूप में खीर लड्डू तरह-तरह के अन्य व्यंजन परोस कर उसकी मूर्ति के आगे भोग लगाया गया यह मरने वाले के प्रति समर्पण भाव था किंतु जीते जी कोई समर्पण भाव नहीं दिखाया गया कोई सेवा संकल्प मन में उद्गार नहीं आया अगर यही समर्पण भाव उसके जीवन काल में दिखाकर अच्छे-अच्छे व्यंजन खिलाये होते अच्छी सेवा टहल की होती तो मरने के बाद अगर मूर्ति के आगे यह व्यंजन नहीं भी परोस्ते तब भी मरने वाले की आत्मा आपकी स्मृतियों के चलते प्रसन्नचित होती बाद में क्या वह खाने आ रहा है फिर यह दिखावा क्यों खुद ही बना लेते हैं खुद ही उसे दिखा कर खा लेते हैं यह सब मृत्यु से पहले परिजनों द्वारा किया जाना चाहिये तभी आपका संकल्प सेवा पूर्ण होता है तभी मरने वाले की आत्मा आपसे तृप्त होती है जो भी दान सत्कर्म परोपकार दया भाव दिखाना है वह जीते जी समय रहते कर लेना चाहिये क्योंकि वृद्धा अवस्था में सिर्फ उल्लू की तरह बैठे हुए झांकना है कोई बात करने के लिए भी मुश्किल से ही तैयार होता है इसलिये अपनी आने वाली युवा पीढ़ी को पश्चात संस्कृति से बचाये विदेशी चलन विदेशी शिक्षा विदेशी संस्कृति को अपनाना हमें अपनों से दूर कर रहा है हमें हमारी संस्कृति से दूर कर रहा है आजकल के पश्चात संस्कृति ग्रहण करने वाले बच्चे वृद्धो से घर के बड़ों से ऊंचे स्वर में बात करते हैं उनकी बात का कोई महत्व नहीं होता वह कुछ कहते हैं तो सुनने को तैयार नहीं होते बहुत से बड़े शहरों में तो बड़े बूढ़ों को ले जाकर कहीं दूर छोड़ आते हैं वृद्ध आश्रमों में भेज देते हैं यह सब पश्चात संस्कृति का असर है इसलिये अपनी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति मे वापस आओ विदेशी सभ्यता विदेशी शिक्षा कहीं तुम्हें अपनों से दूर न कर दे ताउम्र मनुष्य जिनके लिये कमाने पर लगा रहता है कहीं वृद्धि अवस्था में तुम्हें तुम्हारे संस्कार विहीन परिजन बोझ ना समझने लगे इसलिये अपनी युवा पीढ़ी को अच्छे संस्कार अवश्य दें उन्हें धर्म कर्म पूजा पाठ कथा आदि सुनने के लिए प्रेरित करे श्री श्याम वैकुंठ धाम श्यामपुर हरिद्वार में बालाजी का दरबार 17 मार्च 2025 को लगेगा परम पूज्य गुरुदेव श्री महंत श्यामसुंदर दास जी महाराज के कर कमलों द्वारा बालाजी के श्री चरणों से भक्तजनों की समस्या के निस्तारण हेतु निशुल्क विभूति प्रदान की जायेगी
 

