भगवान राम का नाम ही भवसागर की और जाने वाली नैया है श्री महंत रघुवीर दास महाराज
संपादक प्रमोद कुमार
हरिद्वार वरिष्ठ पत्रकार ठाकुर मनोजानंद हरिद्वार की पावन और पवित्र धरा पर स्थित श्री सुदर्शन आश्रम अखाड़े के दिव्य प्रांगण में भक्ति और ज्ञान की एक अभूतपूर्व त्रिवेणी प्रवाहित हुई, जहाँ उपस्थित विशाल भक्त समूह को प्रातः स्मरणीय परम पूज्य श्री महंत रघुवीरदास महाराज जी के मुखारविंद से निःसृत ज्ञानरूपी अमृत का पान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। महाराज श्री ने अपने ओजस्वी और कल्याणकारी वचनों के माध्यम से राम नाम की उस अनंत महिमा का प्रतिपादन किया, जो मानव जीवन के समस्त दुखों का अंत करने वाली और परम आनंद की प्रदाता है। उन्होंने अत्यंत गूढ़ आध्यात्मिक सत्यों को सरल वाणी में पिरोते हुए स्पष्ट किया कि इस नश्वर संसार में ‘राम’ नाम केवल दो अक्षरों का समूह मात्र नहीं है, अपितु यह वह ‘भाव तारणहारी नैया’ है, जिस पर सवार होकर जीव इस अत्यंत दुर्गम और दुस्तर भवसागर को बिना किसी भय के सहज ही पार कर सकता है। महाराज जी ने बड़ी ही मार्मिकता से समझाया कि संसार की मोह-माया और विषय-विकारों की उत्ताल तरंगें मनुष्य को सदैव विचलित करती रहती हैं, किंतु जिसके पास राम नाम की सुदृढ़ पतवार है, उसे काल का प्रवाह भी स्पर्श नहीं कर पाता। उनके अनुसार, वर्तमान के इस आपाधापी भरे और तनावपूर्ण युग में जहाँ मनुष्य मानसिक शांति के लिए दर-दर भटक रहा है, वहाँ राम का नाम ही जीवन को सफल और सार्थक करने की वह एकमात्र युक्ति है, जो हृदय के अंतस्तल को शुद्ध कर उसमें दैवीय प्रकाश का संचार करती है।महाराज श्री ने आगे विस्तार देते हुए कहा कि मानव जीवन का परम लक्ष्य केवल भौतिक सुख-सुविधाओं का संचय करना नहीं, बल्कि उस परम तत्व से जुड़ना है जो जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र से मुक्ति दिला सके। उन्होंने श्री सुदर्शन आश्रम के पवित्र वातावरण में गूँजती अपनी वाणी से भक्तों को यह बोध कराया कि राम का नाम ही वह परम ‘मुक्ति का मार्ग’ है, श्री महंत रघुवीर दास महाराज ने कहा राम नाम की भक्ति केजिस मार्ग पर चलकर साधक अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानता है और ईश्वर के सामीप्य का अनुभव करता है। महाराज जी के वचनों ने स्पष्ट किया कि शास्त्रों और पुराणों का समस्त सार इसी नाम जप में समाहित है। जब भक्त पूर्ण शरणागति के भाव से राम नाम का आश्रय लेता है, तो उसके संचित पापों का क्षय होने लगता है और जीवन में एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का उदय होता है जो उसे लोक और परलोक दोनों में विजय दिलाती है। महाराज श्री ने उपस्थित जनसमूह को प्रेरित किया कि वे अपने दैनिक कार्यों को करते हुए भी निरंतर मानसिक रूप से प्रभु के नाम का सुमिरन करते रहें, क्योंकि यही वह दिव्य औषधि है जो मन के विकारों को दूर कर जीवन को सेवा, संयम और समर्पण से भर देती है। उनके इन पावन वचनों ने भक्तों के हृदय में भक्ति की एक नई ज्योति प्रज्ज्वलित की और उन्हें यह विश्वास दिलाया कि राम नाम का अवलंबन ही प्रत्येक संकट में रक्षक और अंततः मोक्ष प्रदाता है।इसी पावन प्रसंग और महाराज जी के दिव्य भावों को समर्पित एक विशेष दोहा यहाँ प्रस्तुत है:राम नाम की नाव चढ़ि, तजकर सब जंजालभवसागर से पार करि, राखै दीनदयाल।।
 

