आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने नवीकरणीय अल्कोहलों को उच्च-मूल्य रसायनों में परिवर्तित करने की सतत विधि विकसित की
संपादक प्रमोद कुमार
 
• नई उत्प्रेरक (कैटेलिटिक) प्रक्रिया दवाओं और उन्नत सामग्रियों में उपयोग होने वाले जटिल रसायनों के निर्माण के लिए अधिक स्वच्छ और सतत विकल्प प्रदान करती है।
रुड़की, उत्तराखण्ड | 04 अगस्त, 2026: विश्वभर में पारंपरिक रासायनिक विनिर्माण के स्वच्छ और टिकाऊ विकल्पों की खोज के बीच, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (आईआईटी रुड़की) के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी सतत उत्प्रेरक (कैटेलिटिक) विधि विकसित की है, जो नवीकरणीय अल्कोहलों को जटिल कार्बनिक अणुओं में परिवर्तित करती है। ये अणु औषधियों तथा उन्नत कार्बनिक सामग्रियों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले महत्वपूर्ण आधारभूत रासायनिक अवयव (बिल्डिंग ब्लॉक्स) हैं। प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में प्रकाशित यह अध्ययन हरित रसायन (Green Chemistry) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देता है तथा दर्शाता है कि किस प्रकार नवीकरणीय कच्चे पदार्थ (Renewable Feedstocks) और पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध निकेल उत्प्रेरक (Nickel Catalyst) अत्यधिक चयनात्मक रासायनिक संश्लेषण को संभव बना सकते हैं।
यह अध्ययन आईआईटी रुड़की के रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. देबाशीष बनर्जी के नेतृत्व में किया गया। इसमें लिगैंड-सक्षम (Ligand-enabled) निकेल उत्प्रेरित प्रक्रिया का प्रदर्शन किया गया है, जो जैव-आधारित (Biomass-derived) अल्कोहलों को प्रभावी रूप से ट्राइसब्स्टीट्यूटेड ओलेफिन्स (Trisubstituted Olefins) और 1,3-डाइन्स (1,3-Dienes) में परिवर्तित करती है। ये दोनों प्रकार के औद्योगिक रूप से महत्वपूर्ण रासायनिक अवयव औषधियों तथा उन्नत कार्बनिक सामग्रियों के विकास में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
पारंपरिक रासायनिक संश्लेषण में सामान्यतः अनेक चरणों वाली जटिल प्रक्रियाओं तथा महंगे उत्प्रेरकों की आवश्यकता होती है। आईआईटी रुड़की के इस शोध में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध तथा पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले निकेल उत्प्रेरक का उपयोग करते हुए एक मॉड्यूलर और दक्ष उत्प्रेरक पद्धति विकसित की गई है, जो नवीकरणीय अल्कोहलों को सतत कच्चे पदार्थ के रूप में उपयोग करते हुए उच्च स्टीरियो-चयनात्मकता (Stereoselectivity) प्राप्त करती है।
इस प्रक्रिया के माध्यम से शोधकर्ताओं ने 27 ट्राइसब्स्टीट्यूटेड ओलेफिन्स का संश्लेषण किया, जिनमें 98:2 (E/Z) तक की स्टीरियो-चयनात्मकता प्राप्त हुई। साथ ही 23 उच्च-चयनात्मक 1,3-डाइन्स का भी सफलतापूर्वक संश्लेषण किया गया, जिनका E/Z अनुपात 20:1 से अधिक रहा। शोधकर्ताओं ने इस विधि की बहुपयोगिता का प्रदर्शन डीएल-गैलेक्टोज़ (DL-Galactose), अल्फा-टोकोफेरॉल (विटामिन E) जैसे जैविक रूप से महत्वपूर्ण अणुओं के लेट-स्टेज फंक्शनलाइजेशन तथा टैमोक्सीफेन एनालॉग एवं पॉलीएरोमैटिक हाइड्रोकार्बनों के संश्लेषण के माध्यम से भी किया। इससे औषधीय एवं पदार्थ रसायन (Medicinal and Materials Chemistry) में इसकी व्यापक उपयोगिता स्पष्ट होती है।
शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह उत्प्रेरक अभिक्रिया आणविक स्तर पर किस प्रकार संचालित होती है। इससे प्राप्त महत्वपूर्ण यांत्रिक (Mechanistic) जानकारियाँ भविष्य में अधिक प्रभावी और सतत उत्प्रेरक प्रणालियों के विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं।
इस उपलब्धि पर टिप्पणी करते हुए आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रो. के. के. पंत ने कहा, “रसायन विज्ञान में मूलभूत अनुसंधान स्वच्छ और अधिक टिकाऊ प्रौद्योगिकियों के विकास की आधारशिला है। नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित यह शोध वैश्विक वैज्ञानिक चुनौतियों का समाधान करने तथा सतत रासायनिक संश्लेषण के भविष्य को सशक्त बनाने की दिशा में आईआईटी रुड़की की उच्च-गुणवत्ता वाले अनुसंधान के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”
शोध के महत्व पर प्रकाश डालते हुए रसायन विज्ञान विभाग, आईआईटी रुड़की के प्रो. देबाशीष बनर्जी ने कहा, “हमारा उद्देश्य एक ऐसा उत्प्रेरक मंच विकसित करना था, जो आसानी से उपलब्ध नवीकरणीय अल्कोहलों को पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध धातु-आधारित उत्प्रेरक की सहायता से उच्च चयनात्मकता के साथ संरचनात्मक रूप से जटिल तथा औद्योगिक रूप से मूल्यवान अणुओं में परिवर्तित कर सके। एक प्रभावी संश्लेषण विधि विकसित करने के साथ-साथ हमारा अध्ययन ऐसी यांत्रिक समझ भी प्रदान करता है, जो नवीकरणीय कच्चे पदार्थों पर आधारित भविष्य की उत्प्रेरक अभिक्रियाओं के विकास में सहायक हो सकती है।”
यह शोध हरित रसायन की उस वैश्विक दिशा के अनुरूप है, जिसमें नवीकरणीय कच्चे पदार्थों, ऊर्जा-कुशल उत्प्रेरक प्रक्रियाओं तथा रासायनिक अपशिष्ट में कमी को विशेष महत्व दिया जा रहा है। जैव-आधारित अल्कोहलों को नवीकरणीय कच्चे पदार्थ के रूप में अपनाकर तथा महंगे बहुमूल्य धातु उत्प्रेरकों के स्थान पर पृथ्वी पर प्रचुर मात्रा में उपलब्ध और किफायती निकेल का उपयोग करके यह शोध पर्यावरण-अनुकूल रासायनिक संश्लेषण को बढ़ावा देता है और सतत विनिर्माण के सिद्धांतों को मजबूत करता है।
यह अध्ययन आईआईटी रुड़की के आद्रिजा घोष एवं पुरुषोत्तम द्वारा, कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय (McGill University) के प्रो. चाओ-जुन ली के सहयोग से किया गया। इस शोध को शिक्षा मंत्रालय के STARS कार्यक्रम तथा अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) (पूर्व में साइंस एंड इंजीनियरिंग रिसर्च बोर्ड – SERB), भारत सरकार का वित्तीय सहयोग प्राप्त हुआ। वहीं छात्र शोधकर्ताओं को प्रधानमंत्री अनुसंधान फेलोशिप (PMRF) के माध्यम से सहायता प्रदान की गई, जो भारत में उच्च-स्तरीय मूलभूत अनुसंधान को प्रोत्साहित करने की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
विश्वभर के उद्योग अधिक स्वच्छ और संसाधन-कुशल विनिर्माण प्रौद्योगिकियों की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में यह अध्ययन सतत कार्बनिक संश्लेषण (Sustainable Synthetic Chemistry) के क्षेत्र में उपलब्ध वैज्ञानिक साधनों का विस्तार करता है। यह पद्धति शोधकर्ताओं को नवीकरणीय संसाधनों से जटिल कार्बनिक अणुओं के संश्लेषण के लिए एक नई रणनीति प्रदान करती है और भविष्य में नवीकरणीय कच्चे पदार्थों पर आधारित उत्प्रेरक रसायन (Catalytic Chemistry) के क्षेत्र में नए अनुसंधानों को प्रेरित करने की क्षमता रखती है।

