मा गंगा की महिमा दिव्यता, शुद्धता और जीवन का अनन्त स्त्रोत निधि राणा

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संपादक प्रमोद कुमार
हरिद्वार श्री प्रेम नगर आश्रम हरिद्वार में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के समापन के पश्चात मां गंगा की विधिवत पूजा अर्चना करते हुए परम पूज्य स्वामी श्री हरि कृष्ण महाराज ने कहा मोक्ष दाहिनी मां भागीरथी गंगा संपूर्ण सृष्टि का कल्याण करती है उन्हें मुक्ति प्रदान करती हैं और उनके पापों का नाश कर उनके जीवन को पाप मुक्त करती हैं कथा व्यास विदुषी देवी भवानी ने कहा जिसकी भगवान में आस्था है भगवान की भी उसमें आस्था होती है इसलिए ईश्वर में अपनी आस्था बनाए रखें ताकि ईश्वर भी आप पर अपनी छत्रछाया बनाये रखें ईश्वर भक्तों की सिर्फ आस्था देखते हैं बाकी सब कुछ ईश्वर का बनाया हुआ है ईश्वर ना धन चाहते हैं ना संपदा चाहते हैं ना दौलत चाहते हैं और ना दिखावे की भक्ति चाहते हैं सिर्फ आस्था देखते हैं इस अवसर पर बोलते हुए भाजपा की मंडल उपाध्यक्ष श्रीमती निधि राणा ने कहाभारतीय संस्कृति में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि जीवन, आस्था और मोक्ष की आधारशिला है। हजारों वर्षों से करोड़ों लोग इस पवित्र धारा को माँ के रूप में पूजते आए हैं। चाहे धार्मिक ग्रंथ हों, पुराण हों, या लोकगीत—हर जगह गंगा की महिमा ऐसे झरती है जैसे उसकी अपनी निर्मल धारा।
गंगा का उद्गम हिमालय के गोमुख से होता है, पर उसकी महिमा का आरम्भ उससे कहीं पहले, देवताओं और ऋषियों की प्रार्थनाओं से माना जाता है। कहा जाता है कि स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगा का अवतरण भगवान शिव की जटाओं में समाकर हुआ, ताकि इसकी वेगमयी धारा से पृथ्वी और मानवता दोनों सुरक्षित रह सकें। इसी घटना में गंगा की करुणा, मातृत्व और संरक्षण की भावना प्रकट होती है।
गंगा माता का स्पर्श मात्र मन और शरीर दोनों को पवित्र करने वाला माना गया है। जब मनुष्य दुखों से घिर जाता है, जीवन भारी लगने लगता है, तब गंगा की धारा के किनारे बैठकर मिलने वाली रहस्यमयी शांति शब्दों में नहीं बंध सकती। उसका कलकल बहता स्वर ऐसा लगता है मानो माँ अपने बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर कह रही हो—
“डर मत, मैं यहीं हूँ।”
गंगा का जल केवल शास्त्रों में नहीं, विज्ञान में भी अद्भुत माना गया है। उसकी स्वच्छता, उसकी जीवनी शक्ति, और उसके स्थायित्व ने सदियों से विद्वानों को चकित किया है। इसीलिए भारत में गंगा को अमृत के समान माना गया—ऐसा अमृत जो शरीर ही नहीं, आत्मा को भी तृप्त करता है।
गंगा तटों पर बसे नगर—हरिद्वार, ऋषिकेश, वाराणसी, प्रयागराज—केवल शहर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा के केन्द्र हैं। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति अपने मन का बोझ हल्का कर लेता है। चाहे कोई साधक हो, कोई गृहस्थ, कोई तपस्वी या कोई आम यात्री—गंगा सबको एक समान स्नेह देती है।
गंगा की यही अनोखी बात उसे “माँ” बनाती है।
कुंभ और गंगा आरती जैसी परम्पराएँ केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव-जीवन की गहराई को व्यक्त करने वाले अद्भुत अनुभव हैं। जब हजारों दीपक एक साथ गंगा की लहरों पर थिरकते हैं, तो ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रकृति भी उस क्षण को पूजा में बदल रही हो। उस समय आरती की धुन, घंटियों की आवाज़, धूप की सुगंध और गंगा की ठंडी बयार मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जो चिरकाल तक हृदय में अंकित रहता है।
गंगा माता भारतीय संस्कृति की उस धारा का प्रतीक हैं जो देती है पर मांगती नहीं।
वह खेतों को उर्वर बनाती है, प्यास बुझाती है, जीवन को गति देती है, पर बदले में कुछ नहीं चाहती। यही मातृत्व का सच्चा रूप है—निस्वार्थ प्रेम।
गंगा की महिमा अनंत है। वह केवल नदी नहीं, बल्कि
संस्कृति है
सभ्यता है शुद्धता हैआध्यात्मिकता है
और मानवता को जोड़ने वाली अमर धारा है।
गंगा का हर पल कल्याणकारी है, हर लहर जगत के लिए मंगलमय है। यही कारण है कि भारतीय जन-मन सदियों से एक ही प्रार्थना करता आया है—
“हे माँ गंगे, हमारे जीवन को भी अपनी निर्मल धारा की तरह पवित्र और शुद्ध बना दो। हमें अपने चरणों में स्थान दो, और हम पर सदैव अपनी कृपा बरसाती रहो।”

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