वीरमाता विद्यावती कौर: एक कोख से जन्मा इंकलाब, एक आंगन से निकले कई बलिदानी -नीरज सैनी
संपादक प्रमोद कुमार
रुड़की, 1 जून 2026 ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ का उद्घोष करने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह की वीरमाता विद्यावती कौर जी की आज 51वीं पुण्यतिथि है। 1 जून 1975 को उन्होंने अंतिम सांस ली थी। श्रीमती विद्या कौर के लिए यह जीवन का सबसे बड़ा गर्व था कि वे भारत माता के उस सपूत की जननी थीं जिसने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया।
 
*महर्षि दयानंद के शिष्य का परिवार*
माता विद्यावती कौर के पति सरदार किशन सिंह स्वयं एक प्रखर देशभक्त थे। वे महर्षि दयानंद सरस्वती के अनन्य शिष्य सरदार अर्जुन सिंह के पुत्र थे। यह सरदार अर्जुन सिंह के ही दिए संस्कार थे कि पूरा परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में तन-मन-धन से समर्पित हो गया। घर का हर सदस्य देश के लिए जीया और देश के लिए ही कुर्बान हुआ।
*देवरों की कुर्बानी, पति का संघर्ष*
माता विद्यावती के देवर सरदार अजित सिंह ने देश की आजादी के लिए 28 वर्ष विदेश में रहकर क्रांतिकारी आंदोलन चलाया। 15 अगस्त 1947 को जब उन्होंने देश के विभाजन की खबर सुनी तो इस आघात को सह न सके और उसी क्षण उनका देहांत हो गया।
उनके दूसरे देवर सरदार स्वर्ण सिंह ने भी अंग्रेजों की जेल में अमानवीय यातनाएं सहते हुए भारत माता के लिए बलिदान दे दिया। पति सरदार किशन सिंह का अधिकांश जीवन जेल और कचहरी के चक्कर काटते बीता।
*बेटों ने भी चुना फांसी का रास्ता*
शहीद भगत सिंह से छोटे भाई कुलतार सिंह और कुलबीर सिंह भी कई-कई वर्ष अंग्रेजों की जेलों में बंद रहे। इस प्रकार माता विद्यावती कौर एक साथ एक महान देशभक्त की पत्नी, क्रांतिवीरों की भाभी और वीरों की माता थीं।
*त्याग और तपस्या की मूरत*
इतने बलिदानों के बाद भी माता विद्यावती के मुख पर कभी शिकन नहीं आई। उन्होंने अपना सारा दुख कलेजे में दबाकर देश की आजादी का सपना पाला। बेटे भगत सिंह को फांसी होने के बाद जब उनसे पूछा गया तो उनका उत्तर था – “मुझे गर्व है कि मैंने देश के लिए बेटा जना।”
*शत-शत नमन*
ऐसी महान पुण्यात्मा, त्याग की प्रतिमूर्ति, वीरमाता विद्यावती कौर जी की पुण्यतिथि पर देश उन्हें शत-शत नमन करता है। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति, संस्कार और बलिदान का संदेश देता रहेगा।

